आज जबकि सब कुछ सीमाओं में बंधा हुआ है, एक आकाश ही है जो हमारी कल्पनाओं को पर लगाता है। इस खुले आसमान में उड़ान भरने के लिए आपका स्वागत है।
गुरुवार, 25 मार्च 2010
What are we!!!!!
Take for example, felling of trees inside B.H.U campus. During past few months several trees have been chopped down in order to build up new structures. All this being done under the banner of so called DEVELOPMENT. Why developing on the cost of such valuable asset.
Another thing that can be brought up is the quality of education that's been served in this esteemed institution. Most of the departments lack even proper structure to carry on with their specificities. All they have is a bunch of students, sometimes insufficient faculty and rotten benches. Student come in this prestigious university and what they get here is a long and tiring lesson of patience. Over the time period of their courses they become master in the art of saying " arrey sab chalta hai yaar, hone do jo ho raha hai, hume kya hai degree lo aur chalo." This very thing they carry throughout their lives wherever they go.
Leave aside them, they are common people. Why in the world we stopped questioning things. I mean thats the part of our job right. I ask all my batch mates and seniors to wake up and do what we are entitled for.
सोमवार, 22 मार्च 2010
मंज़र
पलके जो झपकी ज़रा सी वो मंज़र कहीं नहीं,
कौन कहता है जो चाहो वो तुम्हे मिल जाएगा,
हसीं लम्हा ये ज़िन्दगी का सभी को मयस्सर नहीं.
चिराग तले अँधेरा
एक कहावत जो माँ से सुनी थी आज उसके अस्तित्व को महसूस किया है. इससे चिराग की बदकिस्मती कहिये या उसकी नाकामी. वो चिराग जो अपनी सीमित शक्ति के बावजूद दूसरों को रास्ता दिखता है अपने अन्दर एक घना अँधेरा छुपाये होता है. ऐसा ही कुछ मै अपने आसपास देख सकता हूँ. एक विभाग जो की अपने मूल रूप में सम्प्रेषण का घर है, वहां स्वयं सम्प्रेषण नामक वस्तु का आभाव है. कोई किसीसे कुछ बोल नहीं सकता क्योकि विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता यहाँ लागू नहीं होती. आप नहीं जान सकते की ऐसा क्यूँ है. हाँ अगर आपने धरा के विपरीत जाने की कोशिश की तो मूह की खानी पड़ सकती है. सारा सम्प्रेषण एक्मार्गीय है. खैर जैसे इस दुनिया की यानि की सम्प्रेषण की दुनिया की बाकि समस्याएँ दूर हुई है इस समस्या का भी कोई न कोई हल तो अवश्य होगा. जरुरत है उस चिराग को चिराग दिखाने की.
शनिवार, 20 मार्च 2010
कोयल और बौर
गुरुवार, 18 मार्च 2010
ये जिंदगी...
एक दिल दिया और वो भी तनहा दिया।
मुद्दतें बीत गयी थीं तुझे देखे ऐ ख़ुशी,
तुमने यूँ अचानक आकर चौंका दिया।
किससे करूँ शिकायत बर्बाद होने पर,
हमने ही तो कातिलों को मौका दिया।
चारों तरफ तो मेरे दोस्तों की भीड़ थी,
फिर कौन था वो जिसने मुझे धोखा दिया?
शिकवा न कीजियेगा कि बेवफा हूँ मैं,
अदाएं थीं आपकी, जिनको लौटा दिया।
अफ़सोस न कर 'विनीत' किस्मत का खेल है,
लेते चलो जिन्दगी ने तुम्हे जितना दिया.
अब तो हमें जाना पड़ेगा- भाग 3
शनिवार, 13 मार्च 2010
तिनका-तिनका
बुधवार, 3 मार्च 2010
होली तो अब हो ली....
मुझे याद है कि होली के मौके पर हमारे गाँव में गीत गाये जाते थे। इस बार भी गाये गए लेकिन वो मज़ा नहीं आया जो चन्द साल पहले आया था। होली भी अब प्रोफेशनल हो गयी थी, रिश्तों की तरह। ये वही गाँव था जहां लोग आपसी भेदभाव भुलाकर प्रेम से हर त्यौहार मनाते थे। अब तो होली भी हैप्पी होली हो गयी। अपने हिस्से के अबीर गुलाल भी इस गाँव ने खानदानी झगड़ों में उड़ा दिए। होली के लिए तो कुछ बचाया ही नहीं। ये कहानी सिर्फ एक गाँव की नहीं है, बल्कि इस देश के लाखों गांवों की है। हमने अपने त्योहारों के लिए क्या बचाया है, कुछ नहीं। लोग नज़र नहीं आते क्योंकि सब अपनी नौकरियों में मस्त है और कौन चाहेगा कि एक दिन की छुट्टी के बदले इस पागलपन में हिस्सा लेना। अब तो कनेक्ट करने का जिम्मा भी नोकिया ने ले लिया है, उसका कॉपीराईट है भाई। बच्चे भी अब खेले तो किसके साथ, सभी व्यस्त हैं। देवदास पारो के साथ और कन्हैया गोपी के साथ खेल लें, वही बहुत है।
अब होली की मस्ती बीते हुए ज़माने की बात लगती है। पुराने लोगों के साथ पुरानी वाली होली भी चली गयी। अब गांवों में भी फागुन आकर चुपके से लौट जाता है। सावन में पेड़ों की डालियाँ झूले का इंतज़ार ही करती रह जाती हैं। अब गन्ने भी गुड के लिए नहीं, चीनी के लिए बोये जाते हैं। अब गांवों में भी लोगो की इज्ज़त उनकी एज नहीं बल्कि पैकेज देखकर की जाती है। उम्मीद है कि आने वाली होली फिर से सबको एक धागे में बाँध दे। तब तक इंतज़ार....
शनिवार, 20 फ़रवरी 2010
कुछ ढूंढ़ता है दिल..
कहीं खो गए हैं वो पल ढूंढ़ता हूँ।
धड़कता नहीं अब मेरा दिल भी शायद,
मैं अब धड़कनों की हलचल ढूंढ़ता हूँ।
संवारा था जिसको तूने जतन से,
वही रेत का मैं महल ढूंढ़ता हूँ।
कहाँ से थी आई, कहाँ को गयी तुम,
इन्हीं कुछ सवालों का हल ढूंढ़ता हूँ।
बताओ 'विनीत' वो फिर कब मिलेंगे,
बड़ी शिद्दत से आजकल ढूंढ़ता हूँ।
इशारों की बात
वो चांदनी रात और तारों की बात।
वक़्त के सफे पलट रहा हूँ आज,
कहीं खो सी गयी है यारों की बात।
डूबा है ये नशे में, बदगुमान है,
कैसे सुनेगा दिल ये हजारों की बात।
दोस्तों की भीड़ में कुचला गया हूँ मैं,
करिए ना अब खुदाया सहारों की बात।
जुबान नहीं सिर्फ इनके कान होते हैं,
सुनी है क्या किसी ने दीवारों की बात।
बुधवार, 17 फ़रवरी 2010
अब तो हमें जाना पड़ेगा....भाग-2
तूझे ऐ जिन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं।
फिराक गोरखपुरी साहब ने क्या खूबसूरत शेर लिखा है। जिन्दगी की हर आहट आदमी पहचान ही जाता है। हमने भी ये आहट पहचान ली थी बीएचयू आने से पहले। यहाँ पर मैंने कुछ महीने बड़ी ही खुशदिली से जिये हैं। मेरे सभी सहपाठी निहायत ही अच्छे साबित हुए। हर किसी ने अपनी अलग पहचान बनाई। आज डिपार्टमेंट जाना ख़ुशी देता है। शायद ये इसलिए भी है कि कुछ दिनों बाद ये बेफिक्री के दिन हवा हो जायेंगे। आज हम साथ-२ टिफिन बांटते हें ( उसमें हमारे एक खास दोस्त का हिस्सा सबसे बड़ा होता है, माफ़ करना यार )। अस्सी घाट कई बार हमसे गुलज़ार हुआ है। वीटी की चाय की दुकान पर जो चुस्कियां हम लेते हैं उसका मुकाबला कोई 5 स्टार होटल की चाय क्या करेगी?
रविवार, 14 फ़रवरी 2010
वक्त को किसने रोका है?
वक्त को किस ने रोका है,
दरिया में बहते पानी को किसने सोखा है,
मंजिल पर जाते राही को किसने रोका है,
मन को विचरित करने में भी कोई बाधा है,
क्या स्याम की राधा भी आधा है,
अगर ऐसा नहीं जग में , तो भला वक्त की चीत्कार क्यों?
आने वाले विरह वेदना से अभी तड़पने की चाहत क्यों,
विनीत तुम तो हो भविष्य वक्ता फिर , तुम में ये अधीर अकारत क्यों,
एक तुम से अनुरोध है, प्रीतम का बिरोध है,
फिर भी बात सुनाता हूँ , आग्रह किये जाता हूँ,
वक्त को यू गुजर जाने दो, भीम की चाए बिछड़ जाने दो,
क्योंकि नाश ,सृजन का द्वार है
बिछुदन के बाद ही मिलन है ,
शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010
अब तो हमें जाना पड़ेगा...भाग - 1
आजकल वक़्त कुछ जयादा ही तेज चल रहा है। बस कुछ दिन और....बस कुछ दिन और बाकी हैं इस शहर को छोड़कर जाने में। अच्छा लगा यहाँ पर आकर। दुनियादारी की भी थोड़ी-बहुत समझ आ गयी यारी के साथ। अब कुछ महीने ही तो बचे हैं जब मैं एक छात्र न रहकर देश का एक जिम्मेदार नागरिक बन जाऊंगा। कुछ ज्यादा ही तेज चाल हो गयी है समय की। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढने का सपना देखा था, पूरा हो गया। १६ जुलाई २००८ के विनीत और आज के विनीत में क्या फर्क आया और क्या शेष रहा ये तो मेरे आस पास रहने वाले लोग जानें। मेरे लिए तो दुनिया कुछ ज्यादा ही बदल गयी.....सपनों से भी ज्यादा।
हाँ...तो बात हो रही थी इस शहर को छोड़कर जाने की। इस शहर ने केवल मुझे ही अपने में नहीं बसाया, ये शहर भी मेरे अन्दर कहीं बस गया है। ऐसा सबके साथ होता है, हर इंसान के साथ। इस शहर ने जो भी मुझे दिया उसको एक नज्म में पिरोने की कोशिश कर रहा हूँ। उम्मीद है आप सबके सामने कल तक ला पाउँगा।
अब भीम की चाय भी मिलनी मुश्किल होगी। चाय तो मिलेगी ही भीम के दूकान से न सही किसी और के दूकान से, मगर वो दोस्त कहीं छूट जायेंगे जो आज साथ में चाय की चुस्कियां लेते हैं। चलो दोस्त भी मिल जायेंगे पर कुछ जाने पहचाने चेहरे, कुछ खास दोस्तों की कमी तो खलेगी ही...कुछ दिनों तक। कुछ और दोस्त भी शामिल हुए हैं इस जमात में। मुझसे तजुर्बे में एक साल पीछे हैं इसीलिए उनको हम जुनिअर्स कहते हैं। मस्तमौला हैं सबके सब, एक से बढ़कर एक। उनके साथ भी वक़्त बिताने में अच्छा लगता है...जानते हैं क्यों...वो मेरी कोई भी बात जल्दी काट नहीं सकते...बेचारे जुनिअर्स जो ठहरे। और अच्छे भी बहुत हैं। बाकी बातें बाद में दोस्तों क्योंकि अभी खाना भी खाना है, लिखने का बहुत मन कर रहा है इसीलिए फिर मिलते हैं.......
कुछ याद आया...
अक्स कोई और होता है शख्स कोई और।
कहाँ गया वो भोलापन, वो सादगी, मासूमियत
कहाँ गए वो लोग जिनसे मिलती थी अपनी तबीयत
वो छोटा सा संसार मेरा, कहाँ गया वो प्यार मेरा
इन सवालों के जवाब कुदरत ये कहके देती है,
वो वक़्त कोई और था ये वक़्त कोई और।
जाने कहाँ गया वो गांव, वो गलियां,वो रास्ते,
गढ़ती थी कहानी दादीमाँ रोज मेरे वास्ते,
वो दोस्त मेरे गए कहाँ, जिनके बिन सूना था जहां,
इन सवालों के जवाब हसरत ये कहके देती है,
वो गांव कोई और था ये शहर कोई और।
कहाँ गया वो रूठना , वो मान जाना, मुस्कुराना
कहाँ गयी वो प्यारी सूरत दिल था जिसका दीवाना,
जाने कहाँ गया वो दौर, दिखता न था कोई और,
इन सवालों के जवाब चाहत ये कहके देती है,
वो धडकनें कोई और थीं, और दिल भी कोई और।
अब जब भी आईने में खुद को देखता हूँ,
अक्स कोई और होता है शख्स कोई और।