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गुरुवार, 10 नवंबर 2011

यूँ ही, अचानक...


कुछ यादें, कुछ चीजें,
आस-पास बिखरी हुईं,
अक्सर दिख जाती हैं,
यूँ ही,
अचानक।
उनका वजूद,
कुछ खास नहीं होता,
लेकिन,
उनसे जुड़ी होती हैं,
कई कहानियाँ,
कई किस्से।

एक लॉकेट,
जो किसी ने दी थी,
बहुत प्यार से,
जो आज वहाँ,
उस खूँटी पर पड़ी है।
या फिर ये टी-शर्ट,
और ये कॉफी मग,
सबके पीछे कई कहानियाँ है,
हर एक चीज में,
दिखता है अक्स,
किसी न किसी का।

और ये कलम,
इसे कैसे भूल सकता हूँ,
किसी ने दी थी,
बड़े प्यार से,
कुछ किस्से, कुछ नगमे,
ये भी तो लिख जाती है,
यूँ ही,
अचानक।

जंजीरें....


वहाँ पेड़ों में जंजीरे बँधी थी,
लोहे की,
काफी मजबूत जंजीरें,
न जाने कौन बाँध गया था,
और क्यों?
मन को कुछ खटक रहा था,
क्यों कोई ऐसा करेगा?
ऐसे तो ये पेड़ उदास से दिखते हैं
चल दिया मैं अपनी राह।
खोया हुआ सा खुद में,
फिर एक रोज जाना हुआ उधर,
जंजीरों में तख्तियाँ लगी थीं अब,
और बच्चे झूल रहे थे,
उन झूलों पर,
गायब हो गयी थीं पेड़ों की उदासी,
और तभी कुछ बूढ़े नजर आये,
जंजीरों में बँधे हुए,
ठीक वैसे ही,
जैसे,
कभी पेड़ों में जंजीरे बँधी थी।

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

जीत....

जीत,


एक छोटा-सा शब्द,

पर अपने आप में,

कितना कुछ समेटे हुए।

असीम उल्लास,

...अनन्त विश्वास,

और नशा भी।

कितना बड़ा उत्प्रेरक,

और कैसी अनुपम अनुभूति!

मैँ जानता हूँ कि मेरी जीत.

किसी और की हार है।

पर थो़ड़ा-सा निर्दय हूँ मैं,

क्योंकि,

मुझे बस जीत ही स्वीकार है।