रविवार, 28 फ़रवरी 2010

AN EXCURSION TO BARKACHHA……………


This was the first time when we had an outing with our juniors. Last year, we went on several small trips with our seniors. But due to our new time schedule or due to indifference towards it from many of us, we never got an opportunity to have this experience with our juniors. And this time without any obstacle, except one, we were able to make our plans mature. Though first it was planned for Saturday, 13th of Feb, then due to some reasons it was scheduled on Sunday, 21st of Feb.

Actually, we were going for a cricket match going to be played between ours and south campus’ teams as it was played in our campus too when their team came to our ground. Same teams…….but a different venue this time……. Unlike last time, now they were the host and we were the guest but like last time……we won and they lost. Winning or losing didn't matter much for us as we were in the mood of a kind of picnic, hence less excitement for the match.

In the morning at almost 8 AM, we were together at the Viswanath Temple, BHU, opposite our dept. The bus was waiting for us and we were waiting for the fun. As bus started towards Barkachha, we started towards enjoyment. In the whole journey to Barkachha, we had been singing and shouting. No hunger……..no thirst…………every necessity was forgotten to the fun we were creating.

We landed there and after having some refreshments, were going to enjoy the match. Like me, most of us were spectators, and not players. But we were waiting for the moment when the match ends and we would have lunch. But after the match due to some inevitable reasons, there was some delay in it. This time we were hungry and thirsty too. Our proposal to go Windom fall was also rejected, again due to some reasons, this time reasons must not be inevitable. At last, we had lunch. Then we had a short walk around the nearby areas. Again we had some tea and pies.

The nice side of being there was that our counterparts at south campus gave us a warm welcome and hosted very well. After bidding them good bye, we got into the bus which was on the way of 'back to pavilion', i.e. BHU campus. In between, we stopped hardly for five minutes to see a sight of a lake in the same region. While coming back,we were having a huge round of dance on the music played in the bus. Our legs, hands and whole body was moving non-stop with the rhythmic beats. Again, we forgot everything, and made the bus a dance floor, until and unless we entered the confines of BHU.

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

कुछ ढूंढ़ता है दिल..

न जाने मैं क्यूँ वो ग़ज़ल ढूंढ़ता हूँ।
कहीं खो गए हैं वो पल ढूंढ़ता हूँ।

धड़कता नहीं अब मेरा दिल भी शायद,
मैं अब धड़कनों की हलचल ढूंढ़ता हूँ।

संवारा था जिसको तूने जतन से,
वही रेत का मैं महल ढूंढ़ता हूँ।

कहाँ से थी आई, कहाँ को गयी तुम,
इन्हीं कुछ सवालों का हल ढूंढ़ता हूँ।

बताओ 'विनीत' वो फिर कब मिलेंगे,
बड़ी शिद्दत से आजकल ढूंढ़ता हूँ।


इशारों की बात

याद आ रही है क्यूँ इशारों की बात।
वो चांदनी रात और तारों की बात।

वक़्त के सफे पलट रहा हूँ आज,
कहीं खो सी गयी है यारों की बात।

डूबा है ये नशे में, बदगुमान है,
कैसे सुनेगा दिल ये हजारों की बात।

दोस्तों की भीड़ में कुचला गया हूँ मैं,
करिए ना अब खुदाया सहारों की बात।

जुबान नहीं सिर्फ इनके कान होते हैं,
सुनी है क्या किसी ने दीवारों की बात।

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

अब तो हमें जाना पड़ेगा....भाग-2

बहुत पहले उन क़दमों की आहट जान लेते हैं।
तूझे ऐ जिन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं।

फिराक गोरखपुरी साहब ने क्या खूबसूरत शेर लिखा है। जिन्दगी की हर आहट आदमी पहचान ही जाता है। हमने भी ये आहट पहचान ली थी बीएचयू आने से पहले। यहाँ पर मैंने कुछ महीने बड़ी ही खुशदिली से जिये हैं। मेरे सभी सहपाठी निहायत ही अच्छे साबित हुए। हर किसी ने अपनी अलग पहचान बनाई। आज डिपार्टमेंट जाना ख़ुशी देता है। शायद ये इसलिए भी है कि कुछ दिनों बाद ये बेफिक्री के दिन हवा हो जायेंगे। आज हम साथ-२ टिफिन बांटते हें ( उसमें हमारे एक खास दोस्त का हिस्सा सबसे बड़ा होता है, माफ़ करना यार )। अस्सी घाट कई बार हमसे गुलज़ार हुआ है। वीटी की चाय की दुकान पर जो चुस्कियां हम लेते हैं उसका मुकाबला कोई 5 स्टार होटल की चाय क्या करेगी?



सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

SPANDAN LOSING ITS CHARM.................................

The first week of Feb, 2010 was devoted to Spandan……………….Spandan, the Inter Faculty Youth Festival of Banaras Hindu University………………..which remains the most awaited programme for the students of the university every year. Students strive for getting a chance to perform in it, and feel immensely lucky if they got one. Others who don’t participate, or can not, feel enormously longing for seeing others’ performance by being just spectators. Spandan has every necessary aspect to captivate each and every student studying here. But the things were quite different this year. It seemed to have lost the charm of this mega-event.
The reasons behind this could be said none other than the new rules and regulations imposed on this event by the university’s high command. And they are many………talked again and again by the kith and kin of the university, whether they are students, teachers or other staff members. Restricting songs and dances to be performed on popular music of Bollywood, is one of such new regulations.
All such rules are made in the name of students’ benefits. But the diminished rate of strength of students attending the event this year shows a different picture. They must be feeling disenchantment with their favorite and own programme. How restricting students from enjoying their own event or binding them in such rules and regulations which cannot be seen to be viable in the 21st century, is beneficial for students? Only God knows……………who else??? Many are saying even that it’s better to have no such an event any more……………………………
In this way of dissatisfaction, Spandan ends along with the week. Well, every story must have a beginning, mid and an end. Every story ends with a hope and every hope provides a new beginning. Lets hope for the better for the Spandan coming up in the next year………………….

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

वक्त को किसने रोका है?

वक्त को किस ने रोका है,

दरिया में बहते पानी को किसने सोखा है,

मंजिल पर जाते राही को किसने रोका है,

मन को विचरित करने में भी कोई बाधा है,

क्या स्याम की राधा भी आधा है,

अगर ऐसा नहीं जग में , तो भला वक्त की चीत्कार क्यों?

आने वाले विरह वेदना से अभी तड़पने की चाहत क्यों,

विनीत तुम तो हो भविष्य वक्ता फिर , तुम में ये अधीर अकारत क्यों,

एक तुम से अनुरोध है, प्रीतम का बिरोध है,

फिर भी बात सुनाता हूँ , आग्रह किये जाता हूँ,

वक्त को यू गुजर जाने दो, भीम की चाए बिछड़ जाने दो,

क्योंकि नाश ,सृजन का द्वार है

बिछुदन के बाद ही मिलन है ,

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

अब तो हमें जाना पड़ेगा...भाग - 1

आजकल वक़्त कुछ जयादा ही तेज चल रहा है। बस कुछ दिन और....बस कुछ दिन और बाकी हैं इस शहर को छोड़कर जाने में। अच्छा लगा यहाँ पर आकर। दुनियादारी की भी थोड़ी-बहुत समझ आ गयी यारी के साथ। अब कुछ महीने ही तो बचे हैं जब मैं एक छात्र न रहकर देश का एक जिम्मेदार नागरिक बन जाऊंगा। कुछ ज्यादा ही तेज चाल हो गयी है समय की। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढने का सपना देखा था, पूरा हो गया। १६ जुलाई २००८ के विनीत और आज के विनीत में क्या फर्क आया और क्या शेष रहा ये तो मेरे आस पास रहने वाले लोग जानें। मेरे लिए तो दुनिया कुछ ज्यादा ही बदल गयी.....सपनों से भी ज्यादा।

हाँ...तो बात हो रही थी इस शहर को छोड़कर जाने की। इस शहर ने केवल मुझे ही अपने में नहीं बसाया, ये शहर भी मेरे अन्दर कहीं बस गया है। ऐसा सबके साथ होता है, हर इंसान के साथ। इस शहर ने जो भी मुझे दिया उसको एक नज्म में पिरोने की कोशिश कर रहा हूँ। उम्मीद है आप सबके सामने कल तक ला पाउँगा।

अब भीम की चाय भी मिलनी मुश्किल होगी। चाय तो मिलेगी ही भीम के दूकान से न सही किसी और के दूकान से, मगर वो दोस्त कहीं छूट जायेंगे जो आज साथ में चाय की चुस्कियां लेते हैं। चलो दोस्त भी मिल जायेंगे पर कुछ जाने पहचाने चेहरे, कुछ खास दोस्तों की कमी तो खलेगी ही...कुछ दिनों तक। कुछ और दोस्त भी शामिल हुए हैं इस जमात में। मुझसे तजुर्बे में एक साल पीछे हैं इसीलिए उनको हम जुनिअर्स कहते हैं। मस्तमौला हैं सबके सब, एक से बढ़कर एक। उनके साथ भी वक़्त बिताने में अच्छा लगता है...जानते हैं क्यों...वो मेरी कोई भी बात जल्दी काट नहीं सकते...बेचारे जुनिअर्स जो ठहरे। और अच्छे भी बहुत हैं। बाकी बातें बाद में दोस्तों क्योंकि अभी खाना भी खाना है, लिखने का बहुत मन कर रहा है इसीलिए फिर मिलते हैं.......

कुछ याद आया...

अब जब भी आइने में खुद को देखता हूँ,
अक्स कोई और होता है शख्स कोई और।

कहाँ गया वो भोलापन, वो सादगी, मासूमियत
कहाँ गए वो लोग जिनसे मिलती थी अपनी तबीयत
वो छोटा सा संसार मेरा, कहाँ गया वो प्यार मेरा
इन सवालों के जवाब कुदरत ये कहके देती है,
वो वक़्त कोई और था ये वक़्त कोई और।

जाने कहाँ गया वो गांव, वो गलियां,वो रास्ते,
गढ़ती थी कहानी दादीमाँ रोज मेरे वास्ते,
वो दोस्त मेरे गए कहाँ, जिनके बिन सूना था जहां,
इन सवालों के जवाब हसरत ये कहके देती है,
वो गांव कोई और था ये शहर कोई और।

कहाँ गया वो रूठना , वो मान जाना, मुस्कुराना
कहाँ गयी वो प्यारी सूरत दिल था जिसका दीवाना,
जाने कहाँ गया वो दौर, दिखता न था कोई और,
इन सवालों के जवाब चाहत ये कहके देती है,
वो धडकनें कोई और थीं, और दिल भी कोई और।

अब जब भी आईने में खुद को देखता हूँ,
अक्स कोई और होता है शख्स कोई और।











सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

UPCOMING SPANDAN DAYS…………………….

Last week we got only one holiday which was national holiday for Republic Day. As always on a national festival, we feel much patriotic……………this time too I was filled with such a feeling. Its not that this feeling comes in us just on the occasion. Feelings can’t go out or come in somebody. Feelings always belong to us……………..but on a special occasion a special kind of feeling becomes more paramount. I enjoyed whole day at home with THE FEELING OF THE DAY. On the same day a cricket match between both the batches of our department, was played on the ground of BHU, which I liked to miss partly because I was not very excited same as on the occasion of the last year’s match and partly because I didn’t want to miss the single holiday of the week. All other days of this week been working days for us……………………without having been taken place of any special activity worth writing here except the waiting moments for

Spandan.Spandan………………….Spandan……………..Spandan…………. had remained much talked topic in the university for the whole last week of Jan, 2010. This was an exciting, joyful and practice time for the students who were selected for performing in Spandan. I too was excited and joyful about it but there was no use of practicing. The new rules of Spandan were quite disappointing for the contestants like me who secured second place in The Intra-Faculty Youth Festivals. This time, only those securing first place there, were selected for The Inter-Faculty Youth Festival, Spandan. In the nutshell, I wasn’t to participate in it.Well, happy upcoming

Spandan days to all of us………………….