गुरुवार, 31 मार्च 2011

Convocation Visit: A Reviving Experience


The award for 'the most relaxing experience of the month' goes to 'Convocation 2011' of the Banaras Hindu University............ Convocation invitation came this month and took us far from the hectic daily schedule of our professional life. Having been invited from BHU to attend convocation 2011, we started to arrange for it.........that included taking leave from our offices and getting seats reserved in a train to Varanasi. Everything was on the boat.....and we were on the way to one of the ancient cities..........

How could we allow ourselves to slip one single moment of enjoyment??? So, celebrations started in the train itself.......and remained continued even after reaching Varanasi. Now, all of us were again together......to share the memorable moments of those days when we were pursuing the master's degree in mass communication........and we were ready to create some more lovely moments........ But some of our batch-mates were missing from the grand celebration.........they missed it........we missed them...........

Amid all the celebrations and enjoyments, the day of convocation came..........we were wearing convocation gown..........how great the moment was!!! Really.....we were in the convocation gown......... We were clicked while receiving degree from the Dean of the Arts Faculty.........while standing or sitting......single or in group........while throwing convocation cap in the air...........wow....again and again.....with different angles...........how great the moment was..........

The next day, again some of us were on the venue in time.......and I was one of them......to hear honorable Vice President of India Hamid Ansari, chief guest of the BHU convocation 2011....... Again, I was a part of a great moment..... But every beginning comes with a certain end.......convocation ceremony ends...... And every end goes with a definite beginning.......celebration continues......

This was the time when some of us had to move to their hometown or back at work in the next three days. I had prepared to stay in my hometown Varanasi for some more days. I had taken leave only for three days and got approval for work from home for some more days as I wanted to stay at home till the festival Holi.

Meanwhile, once again I went to the mass communication department of BHU, and met teachers.......some seniors........and many juniors of mine. My juniors warmly welcomed me and pulled me into their Holi celebration. That was another lovely moment of this great holiday package. Another mentionable thing is to be at home, that always gives a proper relaxation from the tiresome life of outside world........

Just on the next day of Holi, I moved back to my workplace New Delhi. I was in the train to the national capital......remembering all the joy we had in the last journey, when we were together.......remembering all the leisure I got when I was at home.....remembering all the memorable moments I participated in while convocation visit. Reaching Delhi....I came across....again the same hectic life, work pressure and all that......but if their was something new.....or seemed to be new.......was the energy I had regained during the convocation visit..........

बुधवार, 30 मार्च 2011

जाने कैसी आग थी जिसमें ये जले हैं।


कुछ लोग कल यहीं घुट-घुट के मरे हैं।



घट रही है तेजी से किसानों की तादाद,

शायद ये लोग कुछ ज्यादा ही बुरे हैं।



संसद से अभी कैसी ये आवाज है आयी,

क्या इस महफिल में सभी बेसुरे हैं?



उम्मीद न करिए कि चूँ भी यहाँ होगी,

सब लोग यहाँ पर सहमे हैं डरे हैं।



ये तस्वीर यकीनन हिन्दुस्तान की ही है,

क्योंकि इसकी आँखों में आँसू भरे हैं।

सोमवार, 28 मार्च 2011


ये देश का भविष्य है,

कुछ ढूँढ़ रहा है कूड़े के बीच,

शायद शाम की रोटी को।

कितने कमाल की बात है न!

हमारा फेंका गया कचरा भी,

कई घरों में चूल्हा जलाता है।

वैसे भी हम भारतीयों का,

दान धर्म से पुराना नाता है।

मेरी मानिए,

तो एक काम कीजिए,

वो दानवीरता की हद होगी।

जितना ज्यादा हो सके,

कचरा फेंकते जाइये,

इन भूखे बच्चों की उससे,

काफी मदद होगी।

वैसे हमारी सरकार भी,

इस दिशा में काफी सजग है।

कचरा टाइप खाना,

सरकारी स्कूलों में,

आसानी से उपलब्ध है।

गरीबों को अब और,

आप कितना नोचियेगा।

ये भी अपने ही देश के बच्चे हैं,

कभी इनके बारे में भी,

‘सोचिएगा’।

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

एक शहर, बनारस...(भाग-4)

जुलाई का पहला सप्ताह था शायद, मॆ अपनी कोचिंग में बैठा था जहाँ मैं बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने की कोशिश करता था। तभी मेरे ही साथ पढ़ाने वाली एक टीचर आयीं और बताया कि उनके भाई को बीएचयू में मास कॉम की काउंसलिंग के लिए बुलाया गया है। जब उन्होंने मेरे रिज़ल्ट के बारे में पूछा तो मैंने कहा कि मुझे तो कोई चमत्कार ही पास कर सकता है। फिर भी दिल की तसल्ली के लिए रिज़ल्ट देखने चला गया। चमत्कार हो गया था, मैंने किसी तरह दूसरी लिस्ट में जगह बना ली थी।



16 जुलाई 2008, इसी दिन बीएचयू में मेरी काउंसलिंग थी। डिपार्टमेंट में पहुँचा तो देखा कि लड़के तो काफी थे पर लड़कियां कम थीं। दिल बैठ गया कि क्या दो साल इन्हीं लोगों के साथ गुजारना पड़ेगा। लिस्ट देखा तो मन को कुछ ढांढस बंधा। लड़कों के नामों को दरकिनार कर जब लड़कियों का नाम पढ़ता तो हर नाम के साथ एक चेहरा सामने घूम जाता.........(इसके आगे की कहानी वास्तविकता के करीब और पात्रों के नाम पूरी तरह काल्पनिक हैं)

सलोनी, प्रियंका, रिचा, इशिता......नामों की लिस्ट अच्छी खासी लम्बी थी। वहां से पूरी तरह संतुष्ट होकर मैं आकर एक बेंच पर बैठ गया। मेरे बगल में एक मासूम से चेहरे का लड़का बैठा हुआ था। थोड़ी देर बाद मैंने उनसे बातचीत शुरू कर दी।
मैं- आप का शुभनाम?

वो- राजकुमार..और आपका?

मैं- विनीत कुमार सिंह..रहने वाले कहाँ के हैं आप?

राजकुमार- फैज़ाबाद।

इसी तरह बातचीत का क्रम चलता रहा और राज भाई बताते गये कि उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में एम. ए. किया है। वो काफी नज़ाकत से बात कर रहे थे और अपने दाहिने हाथ को एक खास अंदाज में घुमाते जा रहे थे। और मैं सोच रहा था कि वाकई में, ये पक्का फैजाबादी ही है। तभी एक और आवाज ने हम दोनों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। सामने एक सांवला (गहरे रंग वाला सांवला) सा लड़का खड़ा था। पता चला कि भाई साहब का नाम भी कृष्णकांत है और झारखंड के रहने वाले हैं। राज भाई और मैं अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी छांट रहे थे और कृष्णकांत जी बस हमारा चेहरा देख रहे थे।

थोड़ी देर बाद हमें एक हॉल में ले जाया गया जो कि वास्तव में एक लाइब्रेरी थी। वहाँ और भी तमाम लोग बैठे हुए थे। सामने ही एक खूबसूरत लड़की बैठी हुई थी जो कि मेरी आँखों को तसल्ली दे रही थी। वैसे भी रेगिस्तान में कोई भी फूल खिला हो वो खूबसूरत ही लगता है। कुछ ही दूरी पर एक महारथी 10 बच्चों को ज्ञान की घुट्टी पिला रहा था। कृष्णकांत ने फरमाया कि वो पक्का पटना का होगा। बाद में उसकी बात कुछ हद तक सही भी निकली। वो लड़की भी बाहर जा चुकी थी। मैंने भी जल्दी से फार्म भरकर बाहर का रुख किया। किसी भी तरह से उसका नाम पता चल जाए इसी उम्मीद में चार्ट की तरफ फिर देखा। लेकिन कोई फायदा नहीं। थोड़ी देर बाद जब काउंसलिंग के लिए सबका नाम बुलाया जाने लगा तो उसका नाम पता चला- फाल्गुनी। किन्ना सोणा नाम था......

गुरुवार, 17 मार्च 2011

एक शहर, बनारस...(भाग-3)




11 मार्च 2011, एक ऐसा दिन जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता। उस दिन बीएचयू के स्वतंत्रता भवन सभागार में हमारा दीक्षांत समारोह था। ये एक ऐसा पल था जिसकी अभिव्यक्ति शब्दों में नहीं की जा सकती। कम से कम मैं तो नहीं ही कर सकता। मेरे बैच के सभी लोग एक कतार में बैठे थे और मैं बस उन लम्हों को आत्मसात करना चाहता था। हम सभी ने उस पल के लिए काफी इन्तजार किया था। थोड़ी ही देर में हमारा नम्बर आया और हम सभी ने अपनी-2 डिग्री रिसीव की।

अभी उड़ान बाकी है....
अब शुरू हुआ फोटो सेशन। ये तो हमारे बैच का एक जरुरी हिस्सा ही है। कैमरा साथ में न हो तो हमारे बैच में मनाई गई कोई भी खुशी अधूरी ही लगती है। किस्म-2 के पोज बनाकर तस्वीरें उतारी गईं। लड़कियों ने हमेशा की तरह गुलशन में जाकर तमाम प्रकार की मुखमुद्राएं बनाकर तस्वीरें उतरवाईं। इसी में 2 घंटे से उपर का वक्त लगा। कुछ देर बाद खाना पीना हुआ और शाम को फिल्म देखने का प्रोग्राम बना। फिल्म का नाम था तनु वेड्स मनु। फिल्म देखने के कुछ देर बाद मैं जौनपुर जाने वाली बस में सवार था। मैं अपने परिवार से मिलने जा रहा था, बनारस पीछे छूट रहा था।

फ्लैशबैक-

अप्रैल 2008 का महीना, दिन मुझे याद नहीं। मैं बीएचयू मास कॉम का एंट्रेंस देने के लिए बनारस आया था। तब ये शहर मुझे कुछ खास नहीं लगा था। भारत के बाकी शहरों की तरह ही एक और शहर। हालाँकि इसके पहले भी मैं बनारस में कुछ अरसे के लिए रहा था, पर वो ऐसा समय था जब इस शहर में मेरे कुछ गिने-चुने दोस्त ही थे। वही समय था जब मैंने कुछ बड़ा करने का सपना देखना शुरु किया था। काशी हिन्दु विश्वविद्यालय में पढ़ने की तमन्ना भी उसी समय पैदा हुई थी।

एग्जामिनेशन हॉल के बाहर गाड़ियों की लम्बी कतारें लगी हुई थीं। एन्ट्रेंस गेट के बाहर लड़के और लड़कियाँ अंग्रेजी में करेंट अफेयर्स पर गंभीर बहस छेड़े हुए थे और यहाँ मेरा दिल बैठा जा रहा था। कहाँ ये तमाम बड़ी युनिवर्सिटीज़ के ग्रेजुएट्स और कहाँ मैं जौनपुर के तिलकधारी महाविद्यालय से बीए किया हुआ अर्ध-शहरी लड़का। फिर भी चमत्कार होने की उम्मीद में और हनुमान जी पर भरोसा करके एंट्रेंस एग्जाम देने बैठ गया। बेखुदी का आलम ये कि जहाँ पूछे गये 175 प्रश्नों में से 150 ही करने थे वहाँ मैंने सभी प्रश्न कर दिए। बाद में उनको मिटाने के लिए ब्लेड चलाया तो ओएमआर शीट में बड़ा-सा छेद हो गया। तब मुझे लगा कि अब तो यहाँ एडमिशन होने से रहा। बनारस को गुड बॉय कहने का पूरा इंतजाम हो गया था।



एक शहर, बनारस..(भाग-2)

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कैंपस में पहुँचकर काफी अच्छा लग रहा था। कुछ महीनों बाद बिरला हॉस्टल की उसी लॉबी में अपना डेरा जमा जो दो सालों तक मेरा बसेरा था। फिर भी कुछ कचोट रहा था। अब कमरा नम्बर 226 में अलसुबह “का हो गुरु” कहकर जगाने वाले अजीत भाई नहीं रहते थेा सुबह-2 जब वो केवल तौलिया लपेटकर यहाँ से वहाँ कूदते तभी मुझे मालूम पड़ता था कि अब क्लास जाने का वक्त हो गया है। काफी चेहरे परिदृश्य से गायब हो गये थे। राघवेन्द्र, मुरलीधर, राजनाथ, सचिन और आलोक तो कन्वोकेशन में आये ही नहीं थे। हॉस्टलर्स में एक मैं था और बाकी अमित, अंकित और धीरज थे। स्टेशन से चलते समय ही हम लोगों ने तय कर लिया था कि गाउन वगैरह रिसीव करने के बाद शाम को अस्सी घाट पर चलेंगे। पढ़ाई के दौरान तो घाट पर खूब जाना होता था। वहां पर हम क्लास के लड़के-लड़कियां खूब गप्पे हांकते, एक दूसरे की खिंचाई करते, हँसते-हँसाते और फिर गंगाजी की आरती में शामिल होते। तब हमारे दिन ऐसे ही मस्ती में गुजरते थे।


हाँ तो दीक्षान्त समारोह के लिए गाउन रिसीव करना भी कोई बच्चों का खेल नहीं था। लड़को की लाईन काफी लंबी थी और हमें अब लग रहा था कि अब उधार के गाउन से ही काम चलाना पड़ेगा। लेकिन किसी तरह आकांक्षा ने हमें गाउन दिलवा दिया। ये वही आकांक्षा थी जिसे मैं मिस हैरान-परेशान कहकर चिढ़ाया करता था। उस दिन वो न होती तो हमें बनारस की परंपरागत आपातकालीन व्यवस्था ‘जुगाड़’ का ही सहारा लेना पड़ता।

शाम को तय प्रोग्राम के अनुसार हम सभी अस्सी घाट पर गये। हमारी आधी क्लास ही आई थी दीक्षान्त समारोह में हिस्सा लेने, इसीलिए कुछ दोस्तों की कमी बुरी तरह खल रही थी। साल भर पहले हम सभी दोस्त मिलकर किसी भी दिन को उत्सव बना देते थे। आज की मस्ती कुछ कम तो थी पर दिल्ली की जिंदगी के सामने तो ये फाइव स्टार लेवल की थी। घाट से लौटकर मैं तो सीधे बिस्तर में पड़ लिया। कल मुझे एम. ए. (मास कॉम) की डिग्री लेनी थी। और कुछ हसीन ख्वाबों को देखने के लिए मैंने अपना चेहरा चादर से ढँक लिया था।


ये है हमारा बिरला हॉस्टल...
पलकें भी चमक जाती हैं सोते में हमारी,

आँखों को अभी ख्वाब छुपाने नहीं आते।

(बशीर बद्र)




बुधवार, 16 मार्च 2011

एक शहर, बनारस..(भाग-1)

एक शहर, जिसका हर रूप इस देश के बाकी शहरों से काफी अलग है, जहाँ जिन्दगी काफी इत्मीनान से चलती है। दुनिया की आपाधापी से दूर इस शहर की अलग ही पहचान है। इस शहर ने मुझे तमाम खूबसूरत यादें दी हैं, कुछ बहुत अच्छे दोस्त दिए हैं। इस शहर को दुनिया बनारस के नाम से जानती है।




इ देखा बनारस हौ....
अभी कुछ दिन पहले अपने दोस्तों के साथ बनारस जाना हुआ। हम लोग बीएचयू के दीक्षांत समारोह में अपनी-2 डिग्रीयां लेने जा रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे वक्त फिर से पीछे की तरफ मुड़ गया है। बनारस रेलवे स्टेशन पर उतरते ही एक अजीब-सी खुशी का अनुभव हुआ। मैं फिर से उस शहर में था जहाँ मैंने अपनी जिंदगी के कुछ सबसे खूबसूरत दिन गुजारे थे। स्टेशन से बाहर निकलकर ऑटो पर बैठते ही अपने ढंग से चलते बनारस के दर्शन हो गये। कुछ चिर-परिचित संबोधनों ने ध्यान आकर्षित किया जो दिल्ली में बड़े ही कर्कश ढंग से कहे जाते हैं। हाँ, अब लग रहा था कि मैं बनारस में हूँ।





मंगलवार, 8 मार्च 2011

नारी...

अपनी ममता की छाँव में,


बच्चों को पालती,

वो एक माँ है।

हर सुख-दुख में साथ निभाती,

अर्धांगिनी है।

कभी तोतली जुबान में पुकारती,

और बाद में आँगन से विदा होती,

बेटी भी है।

अपने भाई के लिए,

सहर्ष त्याग करने वाली,

एक प्यारी-सी बहन है।

वो प्रेमिका है,

जो कभी रुठती है,

कभी मानती है।

वो शक्ति का रुप है,

वात्सल्य का स्वरुप है।

मानवता जिसकी आभारी है,

हाँ, वही तो नारी है।

सोमवार, 7 मार्च 2011

Need, Comfort & Luxury @ 65

How can one just define need, comfort and luxury? It’s really very tough, but I have a simple definition to observe “Onion, Petrol & Beer @ Rs. 65”. Now, I hope one must have understood what I meant by need, comfort and luxury all three at the same price. Onion the central character of even have not’s meal preparation plays a major role in keeping inflation at control, or in short in nonsensical price rise of other food products. In this situation how will people cut out their minimum needs and keep murmuring instead of shouting. No wonder to keep silence and wait for months advise has been given non other than our responsible agro chief Sharad Pawar. He says he doesn’t know when the prices of the food products will come down and nowhere responsible for the onion price hike. He was true, what he didn’t mean by saying this was he only was solely not responsible, there are more to blame upon. Great, is his thoughts; he should not be disturbed because he has his onion in his court. He was right with his observation that natural conditions were the ones responsible for ruining the vegetation and not he. So actually he wasn’t responsible for taking preventive measures. Let it be, why to waste my time on him, rather I should do some “Jugad for my onion”.


Oh… now comes the comfort. Comfort for me is waking up late in the morning. Not going to office, watching television the whole day, in the meanwhile being served hot coffee and snacks, which again includes onions. But let’s just not start onion mandi again. Hmm….so comfort is all about riding a car or a super bike with sufficient fuel in it. The way the prices of comfort are raising, I think I need a job switch, it means every time the price of petrol rises I need to look for a new job. Cool, petrol’s mahima is really great. Even if you cannot afford you have to pay. Nowadays, when I step out of my house and head towards office, I decide to go green and prefer walking, contributing my part to stop global warming. Even when you travel long distances you have to take support from your vehicle that doesn’t eat onion but fuel.

Generally, during weekends we go gala party, and party without drink is like bathroom without water. Oh…bathroom without water is still manageable but party without beer is not. Anyway, so hear is luxury in or way, to rock your world. Don’t know much about beer because haven’t tasted it till now. But as heard from people no beer no cheer and therefore no jeer.

So, we stand with the most incredible example of need, comfort and luxury with the same price at once. @ Rs. 65.

शनिवार, 5 मार्च 2011

ख्वाब...

जब ढल रही है शाम तो चुपके से ढलने दो।


मेरी पलकों के साये में ख्वाबों को पलने दो।



मंजिल दूर होती है तो थक ही जाते हैं कदम,

रवानी है अभी कदमों में थोड़ा और चलने दो।



माना कि अब तक धूप में जलता रहा बदन,

होगी छाँव भी जल्दी जरा मौसम बदलने दो।

गुरुवार, 3 मार्च 2011

FRIENDSHIP WILL ALWAYS BE GREAT!

I am still standing at d street where u left my hand!
trying to catch ur shadow which is running out like sand!
the corner of d eye hs dried up shedding tears!
but d heart is still moist n filled wid fears!
i left everythng n ran at ur every call!
n nw u made sepration made stand b/w us like a wall!
my life was stucked n nights went sleeplees!
i tried too hard to settle but all in a mess!
my heart was sinking n my feelings dried!
my trust in u went splitting n cried!
but one fine morning i woke n realized!
frever being together d love ws sacrificed!
may b u r far n ur emotions i can't see!
but ur voice shows d luv n care u hv fr me!
i m so glad dat ur explainations were so straight!
luv cn subside but frndshp will alwz b great!