The ‘Pan-India Popularity Rating Points (PPRP)’ are out. Believe it or
not, neither the irresistible and ostentatious stars from the world of
celluloid (of course I mean Bollywood or what else would world of
celluloid come to represent in Indian context- certainly not the films
of Ray?) nor the equally irresistible cricket demigods top the
ratings.
Politicians certainly not- how could you even make a reference to
politicians? Don’t you know they are the roots of all evils that
surround us? Sorry, I have to admit that I do suffer from occasional
strokes of Cerebral Memory Imbalance (CMI) and it was one of these
strokes that resulted in the production of this social blasphemy.
Politicians in India do not belong to us – the common men. They have
been nurtured and trained in a controlled anti-India environment in
highly-modern sea labs of Virginia by a bunch of NASA scientists and
Greg Chappel (Yup, that obnoxious Aussie who ruined the career of
Irphan Pathan who, but for his tutelage, would have become an
all-rounder six times better than Sir Garrifield Sobers). The entire
cost of this ‘mission’ was borne by Roosevelt, Churchil, Lord
Dolhousie, Queen Victoria (all of them were allowed to walk out of
their graves by a Christian god whom I last saw in a movie or a Door
Darshasn serial- I can’t recall exactly where...baba where is my
memory drink?)and ......Digvijay Singh (yes, that snobbish royal from
MP did collude with foreigners in this anti-Indian campaign...thank
you baba...courtesy the herbal drink, I can recollect everything now).
Now please forgive me for straying from the information I was to serve
you first as implied in the opening paragraph. But please don’t be
angry folks, I, fortunately or unfortunately (baba drink please), have
just joined media and therefore building on suspense and keeping
audience on tenterhooks saying plenty of things without meaning
anything before coming to the point (only when you think it’s time you
went home and took your wife out for dinner) are traits of my
profession.
Calm dowm...dn’t frown...without further ado, I must announce the name
of the winners of toppers in PPRP. They are a bunch of alpha-Indians
out on the road, street, ground observing fast onto death. They may
appear different with their gears but they have one common agenda- to
rid Bharat Mata or Mother India (I do not mean Nurgis certainly) of
corruption and satanic politicians. Some may be seen sporting saffron
robes while some may be spotted in plain white Gandhian outfits (even
the mom-boy duo who advertises Tide may be envious of their
whiteness). Chances are of also bumping into bush-shirt wearing or
sari-clad penance-figures.
They have been sent to the earth by the god himself who created
Bharat. I must add here that I’m not talking about the god who created
the earth. Bharat was constructed by that great god in such a manner
as it would be free of corruption and all kinds of moral decays and it
was the case with the country till these genetically-engineered
politicians descended here (thanks baba for another sip...did you use
shark’s fin while preparing it?)
I’m going out now as I’m unable to log in to my Facebook ID. I knew
politicians are behind this.....Have to sit on fast unto death till I
am allowed access to my ID...(ya Baba dn’t worry, I’v consumed eight
apples, six oranges, two bowls of porridge and one litter of cane
juice..wn’t have to worry for hunger till my demands are
met).......Want to join me?
आज जबकि सब कुछ सीमाओं में बंधा हुआ है, एक आकाश ही है जो हमारी कल्पनाओं को पर लगाता है। इस खुले आसमान में उड़ान भरने के लिए आपका स्वागत है।
गुरुवार, 15 सितंबर 2011
मंगलवार, 19 जुलाई 2011
The Experience of my Internship ........in brief...
Internship is a great way to improve the personality of the person. I have done the internship in an NGO and Print Media in Lucknow and Bhopal,respectively. These places are the heart cities and capital of their sates. One is well known for its Nawabshahi(Lucknow) and other one is for its beauty of nature(Bhopal). I have done my work one month in each. After going through all the days which I have spent to earn these"precious wealth" I think there should be some processes to give such a chance to the students of any department or any course. I feel proud that I am the part of such a glorious Institution and enlightened Head of Department. I want to say thanks to all the people who are the part of the journey of my internship. My seniors, super seniors and my batch mates who helped me a lot in my bad situation. Last but not the least I want to say thanks to my Head of Department who always be in the first row to improve the knowledge as well as the personality of the students.
गुरुवार, 12 मई 2011
आओ चलते हैं...
आओ चलते है,
उन लम्हों के दरम्याँ,
जब एक ‘कट्टी’ से,
विराम लग जाता था,
दोस्ती पर,
और ‘मिट्ठी’ उस विराम को
कहीं दूर फेंक देती थी।
जब पन्नों के बीच,
मोर के पंख पाले जाते थे,
इस उम्मीद में,
कि ये दो के चार हो जाएँगे।
जब कच्ची अमिया,
जीते हुए कंचे,
सबसे बड़ी पूँजी होती थी।
जब पापा डाँट सकते थे,
बेझिझक,
और अम्मा दुलारती थीं।
चलें वहीं जहाँ आँखों में,
कुछ मासूम से सपने पलते है,
आओ चलते हैँ।
उन लम्हों के दरम्याँ,
जब एक ‘कट्टी’ से,
विराम लग जाता था,
दोस्ती पर,
और ‘मिट्ठी’ उस विराम को
कहीं दूर फेंक देती थी।
जब पन्नों के बीच,
मोर के पंख पाले जाते थे,
इस उम्मीद में,
कि ये दो के चार हो जाएँगे।
जब कच्ची अमिया,
जीते हुए कंचे,
सबसे बड़ी पूँजी होती थी।
जब पापा डाँट सकते थे,
बेझिझक,
और अम्मा दुलारती थीं।
चलें वहीं जहाँ आँखों में,
कुछ मासूम से सपने पलते है,
आओ चलते हैँ।
सुनना कभी तुम भी....
कभी खामोशियों को सुनना,
वो सब कह देंगी,
जो कभी मैं,
तुमसे न कह पाया।
तुम्हारी एक झलक के लिए,
सदियों के इन्तजार की,
चश्मदीद गवाह हैं ये।
तुम्हें रूबरू देखकर,
जब-2 ये दिल धड़का है,
दिल की हर धड़कन को,
तब-2,
इन खामोशियों ने,
बहुत गौर से सुना है।
बहुत मुश्किल है मेरे लिए,
तुमसे कुछ भी कहने को,
शब्दों को चुनना।
इसीलिए,
कभी खामोशियों को सुनना।
वो सब कह देंगी,
जो कभी मैं,
तुमसे न कह पाया।
तुम्हारी एक झलक के लिए,
सदियों के इन्तजार की,
चश्मदीद गवाह हैं ये।
तुम्हें रूबरू देखकर,
जब-2 ये दिल धड़का है,
दिल की हर धड़कन को,
तब-2,
इन खामोशियों ने,
बहुत गौर से सुना है।
बहुत मुश्किल है मेरे लिए,
तुमसे कुछ भी कहने को,
शब्दों को चुनना।
इसीलिए,
कभी खामोशियों को सुनना।
शनिवार, 7 मई 2011
मेरी अम्मा....
जब भी किसी मोड़ पर मैं हूँ हारा,
हरदम मिला मुझको उसका सहारा।
हो कैसे सकती हैं मुश्किल ये राहें,
मेरे संग हरपल हैं उसकी दुआएँ।
जिसकी वजह से मेरा निशां है।
वो मेरी माँ है।।।।।
बड़े प्यार से मेरे सर को दबाती।
बालों में मेरे वो उँगली फिराती।
लगाती मेरे माथे पे काला टीका।
नजर से बचाने का उम्दा तरीका।
धरती पे मेरे लिए वो खुदा है।
वो मेरी माँ है।।।।
उसको पता है मेरी हर जरूरत।
अम्मा हमारी ममता की मूरत।
फिर भी थोड़ा उससे नाराज हूँ मैं।
फितरत से शायद दगाबाज हूँ मैं।
माँ जैसी चाहत मुझमें कहाँ है?
वो मेरी माँ है।।।।
करता तुझे याद दिल्ली में आकर।
रोता हूँ तकिये में चेहरा छुपाकर।
कर देती है मुझको मजबूर दिल्ली।
घर से मेरे है बहुत दूर दिल्ली।
मगर साथ मेरे तेरी दुआ है।
तू मेरी माँ है।।।।।
हरदम मिला मुझको उसका सहारा।
हो कैसे सकती हैं मुश्किल ये राहें,
मेरे संग हरपल हैं उसकी दुआएँ।
जिसकी वजह से मेरा निशां है।
वो मेरी माँ है।।।।।
बड़े प्यार से मेरे सर को दबाती।
बालों में मेरे वो उँगली फिराती।
लगाती मेरे माथे पे काला टीका।
नजर से बचाने का उम्दा तरीका।
धरती पे मेरे लिए वो खुदा है।
वो मेरी माँ है।।।।
उसको पता है मेरी हर जरूरत।
अम्मा हमारी ममता की मूरत।
फिर भी थोड़ा उससे नाराज हूँ मैं।
फितरत से शायद दगाबाज हूँ मैं।
माँ जैसी चाहत मुझमें कहाँ है?
वो मेरी माँ है।।।।
करता तुझे याद दिल्ली में आकर।
रोता हूँ तकिये में चेहरा छुपाकर।
कर देती है मुझको मजबूर दिल्ली।
घर से मेरे है बहुत दूर दिल्ली।
मगर साथ मेरे तेरी दुआ है।
तू मेरी माँ है।।।।।
शुक्रवार, 6 मई 2011
आँखों में जैसे हजारों ख्वाब झिलमिला गये।
बोलिए हम क्या करें जो आप याद आ गये।
बोतल में उतरे आप तो ऐसा कुछ हुआ असर,
जो कभी उतरे ना वो खुमार बन कर छा गये।
मशविरा है मेरा कि परदे में तुम निकला करो,
देखो तुमको देखकर ये फूल भी शरमा गये।
वैसे तो बिन तुम्हारे भी ये जिन्दगी हसीन थी,
तुम मिले तो जिन्दगी को और हसीं बना गये।
महफिल में मुस्कुरा के देखा जो तुमने मुझे,
गैरों की मैं क्या कहूँ यारों को भी जला गये।
बोलिए हम क्या करें जो आप याद आ गये।
बोतल में उतरे आप तो ऐसा कुछ हुआ असर,
जो कभी उतरे ना वो खुमार बन कर छा गये।
मशविरा है मेरा कि परदे में तुम निकला करो,
देखो तुमको देखकर ये फूल भी शरमा गये।
वैसे तो बिन तुम्हारे भी ये जिन्दगी हसीन थी,
तुम मिले तो जिन्दगी को और हसीं बना गये।
महफिल में मुस्कुरा के देखा जो तुमने मुझे,
गैरों की मैं क्या कहूँ यारों को भी जला गये।
शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011
बुधवार, 6 अप्रैल 2011
बुधवार, 30 मार्च 2011
जाने कैसी आग थी जिसमें ये जले हैं।
कुछ लोग कल यहीं घुट-घुट के मरे हैं।
घट रही है तेजी से किसानों की तादाद,
शायद ये लोग कुछ ज्यादा ही बुरे हैं।
संसद से अभी कैसी ये आवाज है आयी,
क्या इस महफिल में सभी बेसुरे हैं?
उम्मीद न करिए कि चूँ भी यहाँ होगी,
सब लोग यहाँ पर सहमे हैं डरे हैं।
ये तस्वीर यकीनन हिन्दुस्तान की ही है,
क्योंकि इसकी आँखों में आँसू भरे हैं।
कुछ लोग कल यहीं घुट-घुट के मरे हैं।
घट रही है तेजी से किसानों की तादाद,
शायद ये लोग कुछ ज्यादा ही बुरे हैं।
संसद से अभी कैसी ये आवाज है आयी,
क्या इस महफिल में सभी बेसुरे हैं?
उम्मीद न करिए कि चूँ भी यहाँ होगी,
सब लोग यहाँ पर सहमे हैं डरे हैं।
ये तस्वीर यकीनन हिन्दुस्तान की ही है,
क्योंकि इसकी आँखों में आँसू भरे हैं।
सोमवार, 28 मार्च 2011
कुछ ढूँढ़ रहा है कूड़े के बीच,
शायद शाम की रोटी को।
कितने कमाल की बात है न!
हमारा फेंका गया कचरा भी,
कई घरों में चूल्हा जलाता है।
वैसे भी हम भारतीयों का,
दान धर्म से पुराना नाता है।
मेरी मानिए,
तो एक काम कीजिए,
वो दानवीरता की हद होगी।
जितना ज्यादा हो सके,
कचरा फेंकते जाइये,
इन भूखे बच्चों की उससे,
काफी मदद होगी।
वैसे हमारी सरकार भी,
इस दिशा में काफी सजग है।
कचरा टाइप खाना,
सरकारी स्कूलों में,
आसानी से उपलब्ध है।
गरीबों को अब और,
आप कितना नोचियेगा।
ये भी अपने ही देश के बच्चे हैं,
कभी इनके बारे में भी,
‘सोचिएगा’।
शुक्रवार, 18 मार्च 2011
एक शहर, बनारस...(भाग-4)
जुलाई का पहला सप्ताह था शायद, मॆ अपनी कोचिंग में बैठा था जहाँ मैं बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने की कोशिश करता था। तभी मेरे ही साथ पढ़ाने वाली एक टीचर आयीं और बताया कि उनके भाई को बीएचयू में मास कॉम की काउंसलिंग के लिए बुलाया गया है। जब उन्होंने मेरे रिज़ल्ट के बारे में पूछा तो मैंने कहा कि मुझे तो कोई चमत्कार ही पास कर सकता है। फिर भी दिल की तसल्ली के लिए रिज़ल्ट देखने चला गया। चमत्कार हो गया था, मैंने किसी तरह दूसरी लिस्ट में जगह बना ली थी।
16 जुलाई 2008, इसी दिन बीएचयू में मेरी काउंसलिंग थी। डिपार्टमेंट में पहुँचा तो देखा कि लड़के तो काफी थे पर लड़कियां कम थीं। दिल बैठ गया कि क्या दो साल इन्हीं लोगों के साथ गुजारना पड़ेगा। लिस्ट देखा तो मन को कुछ ढांढस बंधा। लड़कों के नामों को दरकिनार कर जब लड़कियों का नाम पढ़ता तो हर नाम के साथ एक चेहरा सामने घूम जाता.........(इसके आगे की कहानी वास्तविकता के करीब और पात्रों के नाम पूरी तरह काल्पनिक हैं)
सलोनी, प्रियंका, रिचा, इशिता......नामों की लिस्ट अच्छी खासी लम्बी थी। वहां से पूरी तरह संतुष्ट होकर मैं आकर एक बेंच पर बैठ गया। मेरे बगल में एक मासूम से चेहरे का लड़का बैठा हुआ था। थोड़ी देर बाद मैंने उनसे बातचीत शुरू कर दी।
मैं- आप का शुभनाम?
वो- राजकुमार..और आपका?
मैं- विनीत कुमार सिंह..रहने वाले कहाँ के हैं आप?
राजकुमार- फैज़ाबाद।
इसी तरह बातचीत का क्रम चलता रहा और राज भाई बताते गये कि उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में एम. ए. किया है। वो काफी नज़ाकत से बात कर रहे थे और अपने दाहिने हाथ को एक खास अंदाज में घुमाते जा रहे थे। और मैं सोच रहा था कि वाकई में, ये पक्का फैजाबादी ही है। तभी एक और आवाज ने हम दोनों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। सामने एक सांवला (गहरे रंग वाला सांवला) सा लड़का खड़ा था। पता चला कि भाई साहब का नाम भी कृष्णकांत है और झारखंड के रहने वाले हैं। राज भाई और मैं अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी छांट रहे थे और कृष्णकांत जी बस हमारा चेहरा देख रहे थे।
थोड़ी देर बाद हमें एक हॉल में ले जाया गया जो कि वास्तव में एक लाइब्रेरी थी। वहाँ और भी तमाम लोग बैठे हुए थे। सामने ही एक खूबसूरत लड़की बैठी हुई थी जो कि मेरी आँखों को तसल्ली दे रही थी। वैसे भी रेगिस्तान में कोई भी फूल खिला हो वो खूबसूरत ही लगता है। कुछ ही दूरी पर एक महारथी 10 बच्चों को ज्ञान की घुट्टी पिला रहा था। कृष्णकांत ने फरमाया कि वो पक्का पटना का होगा। बाद में उसकी बात कुछ हद तक सही भी निकली। वो लड़की भी बाहर जा चुकी थी। मैंने भी जल्दी से फार्म भरकर बाहर का रुख किया। किसी भी तरह से उसका नाम पता चल जाए इसी उम्मीद में चार्ट की तरफ फिर देखा। लेकिन कोई फायदा नहीं। थोड़ी देर बाद जब काउंसलिंग के लिए सबका नाम बुलाया जाने लगा तो उसका नाम पता चला- फाल्गुनी। किन्ना सोणा नाम था......
16 जुलाई 2008, इसी दिन बीएचयू में मेरी काउंसलिंग थी। डिपार्टमेंट में पहुँचा तो देखा कि लड़के तो काफी थे पर लड़कियां कम थीं। दिल बैठ गया कि क्या दो साल इन्हीं लोगों के साथ गुजारना पड़ेगा। लिस्ट देखा तो मन को कुछ ढांढस बंधा। लड़कों के नामों को दरकिनार कर जब लड़कियों का नाम पढ़ता तो हर नाम के साथ एक चेहरा सामने घूम जाता.........(इसके आगे की कहानी वास्तविकता के करीब और पात्रों के नाम पूरी तरह काल्पनिक हैं)
सलोनी, प्रियंका, रिचा, इशिता......नामों की लिस्ट अच्छी खासी लम्बी थी। वहां से पूरी तरह संतुष्ट होकर मैं आकर एक बेंच पर बैठ गया। मेरे बगल में एक मासूम से चेहरे का लड़का बैठा हुआ था। थोड़ी देर बाद मैंने उनसे बातचीत शुरू कर दी।
मैं- आप का शुभनाम?
वो- राजकुमार..और आपका?
मैं- विनीत कुमार सिंह..रहने वाले कहाँ के हैं आप?
राजकुमार- फैज़ाबाद।
इसी तरह बातचीत का क्रम चलता रहा और राज भाई बताते गये कि उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में एम. ए. किया है। वो काफी नज़ाकत से बात कर रहे थे और अपने दाहिने हाथ को एक खास अंदाज में घुमाते जा रहे थे। और मैं सोच रहा था कि वाकई में, ये पक्का फैजाबादी ही है। तभी एक और आवाज ने हम दोनों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। सामने एक सांवला (गहरे रंग वाला सांवला) सा लड़का खड़ा था। पता चला कि भाई साहब का नाम भी कृष्णकांत है और झारखंड के रहने वाले हैं। राज भाई और मैं अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी छांट रहे थे और कृष्णकांत जी बस हमारा चेहरा देख रहे थे।
थोड़ी देर बाद हमें एक हॉल में ले जाया गया जो कि वास्तव में एक लाइब्रेरी थी। वहाँ और भी तमाम लोग बैठे हुए थे। सामने ही एक खूबसूरत लड़की बैठी हुई थी जो कि मेरी आँखों को तसल्ली दे रही थी। वैसे भी रेगिस्तान में कोई भी फूल खिला हो वो खूबसूरत ही लगता है। कुछ ही दूरी पर एक महारथी 10 बच्चों को ज्ञान की घुट्टी पिला रहा था। कृष्णकांत ने फरमाया कि वो पक्का पटना का होगा। बाद में उसकी बात कुछ हद तक सही भी निकली। वो लड़की भी बाहर जा चुकी थी। मैंने भी जल्दी से फार्म भरकर बाहर का रुख किया। किसी भी तरह से उसका नाम पता चल जाए इसी उम्मीद में चार्ट की तरफ फिर देखा। लेकिन कोई फायदा नहीं। थोड़ी देर बाद जब काउंसलिंग के लिए सबका नाम बुलाया जाने लगा तो उसका नाम पता चला- फाल्गुनी। किन्ना सोणा नाम था......
गुरुवार, 17 मार्च 2011
एक शहर, बनारस...(भाग-3)
11 मार्च 2011, एक ऐसा दिन जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता। उस दिन बीएचयू के स्वतंत्रता भवन सभागार में हमारा दीक्षांत समारोह था। ये एक ऐसा पल था जिसकी अभिव्यक्ति शब्दों में नहीं की जा सकती। कम से कम मैं तो नहीं ही कर सकता। मेरे बैच के सभी लोग एक कतार में बैठे थे और मैं बस उन लम्हों को आत्मसात करना चाहता था। हम सभी ने उस पल के लिए काफी इन्तजार किया था। थोड़ी ही देर में हमारा नम्बर आया और हम सभी ने अपनी-2 डिग्री रिसीव की।
![]() |
| अभी उड़ान बाकी है.... |
अब शुरू हुआ फोटो सेशन। ये तो हमारे बैच का एक जरुरी हिस्सा ही है। कैमरा साथ में न हो तो हमारे बैच में मनाई गई कोई भी खुशी अधूरी ही लगती है। किस्म-2 के पोज बनाकर तस्वीरें उतारी गईं। लड़कियों ने हमेशा की तरह गुलशन में जाकर तमाम प्रकार की मुखमुद्राएं बनाकर तस्वीरें उतरवाईं। इसी में 2 घंटे से उपर का वक्त लगा। कुछ देर बाद खाना पीना हुआ और शाम को फिल्म देखने का प्रोग्राम बना। फिल्म का नाम था तनु वेड्स मनु। फिल्म देखने के कुछ देर बाद मैं जौनपुर जाने वाली बस में सवार था। मैं अपने परिवार से मिलने जा रहा था, बनारस पीछे छूट रहा था।
फ्लैशबैक-
अप्रैल 2008 का महीना, दिन मुझे याद नहीं। मैं बीएचयू मास कॉम का एंट्रेंस देने के लिए बनारस आया था। तब ये शहर मुझे कुछ खास नहीं लगा था। भारत के बाकी शहरों की तरह ही एक और शहर। हालाँकि इसके पहले भी मैं बनारस में कुछ अरसे के लिए रहा था, पर वो ऐसा समय था जब इस शहर में मेरे कुछ गिने-चुने दोस्त ही थे। वही समय था जब मैंने कुछ बड़ा करने का सपना देखना शुरु किया था। काशी हिन्दु विश्वविद्यालय में पढ़ने की तमन्ना भी उसी समय पैदा हुई थी।
एग्जामिनेशन हॉल के बाहर गाड़ियों की लम्बी कतारें लगी हुई थीं। एन्ट्रेंस गेट के बाहर लड़के और लड़कियाँ अंग्रेजी में करेंट अफेयर्स पर गंभीर बहस छेड़े हुए थे और यहाँ मेरा दिल बैठा जा रहा था। कहाँ ये तमाम बड़ी युनिवर्सिटीज़ के ग्रेजुएट्स और कहाँ मैं जौनपुर के तिलकधारी महाविद्यालय से बीए किया हुआ अर्ध-शहरी लड़का। फिर भी चमत्कार होने की उम्मीद में और हनुमान जी पर भरोसा करके एंट्रेंस एग्जाम देने बैठ गया। बेखुदी का आलम ये कि जहाँ पूछे गये 175 प्रश्नों में से 150 ही करने थे वहाँ मैंने सभी प्रश्न कर दिए। बाद में उनको मिटाने के लिए ब्लेड चलाया तो ओएमआर शीट में बड़ा-सा छेद हो गया। तब मुझे लगा कि अब तो यहाँ एडमिशन होने से रहा। बनारस को गुड बॉय कहने का पूरा इंतजाम हो गया था।
एक शहर, बनारस..(भाग-2)
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कैंपस में पहुँचकर काफी अच्छा लग रहा था। कुछ महीनों बाद बिरला हॉस्टल की उसी लॉबी में अपना डेरा जमा जो दो सालों तक मेरा बसेरा था। फिर भी कुछ कचोट रहा था। अब कमरा नम्बर 226 में अलसुबह “का हो गुरु” कहकर जगाने वाले अजीत भाई नहीं रहते थेा सुबह-2 जब वो केवल तौलिया लपेटकर यहाँ से वहाँ कूदते तभी मुझे मालूम पड़ता था कि अब क्लास जाने का वक्त हो गया है। काफी चेहरे परिदृश्य से गायब हो गये थे। राघवेन्द्र, मुरलीधर, राजनाथ, सचिन और आलोक तो कन्वोकेशन में आये ही नहीं थे। हॉस्टलर्स में एक मैं था और बाकी अमित, अंकित और धीरज थे। स्टेशन से चलते समय ही हम लोगों ने तय कर लिया था कि गाउन वगैरह रिसीव करने के बाद शाम को अस्सी घाट पर चलेंगे। पढ़ाई के दौरान तो घाट पर खूब जाना होता था। वहां पर हम क्लास के लड़के-लड़कियां खूब गप्पे हांकते, एक दूसरे की खिंचाई करते, हँसते-हँसाते और फिर गंगाजी की आरती में शामिल होते। तब हमारे दिन ऐसे ही मस्ती में गुजरते थे।
हाँ तो दीक्षान्त समारोह के लिए गाउन रिसीव करना भी कोई बच्चों का खेल नहीं था। लड़को की लाईन काफी लंबी थी और हमें अब लग रहा था कि अब उधार के गाउन से ही काम चलाना पड़ेगा। लेकिन किसी तरह आकांक्षा ने हमें गाउन दिलवा दिया। ये वही आकांक्षा थी जिसे मैं मिस हैरान-परेशान कहकर चिढ़ाया करता था। उस दिन वो न होती तो हमें बनारस की परंपरागत आपातकालीन व्यवस्था ‘जुगाड़’ का ही सहारा लेना पड़ता।
शाम को तय प्रोग्राम के अनुसार हम सभी अस्सी घाट पर गये। हमारी आधी क्लास ही आई थी दीक्षान्त समारोह में हिस्सा लेने, इसीलिए कुछ दोस्तों की कमी बुरी तरह खल रही थी। साल भर पहले हम सभी दोस्त मिलकर किसी भी दिन को उत्सव बना देते थे। आज की मस्ती कुछ कम तो थी पर दिल्ली की जिंदगी के सामने तो ये फाइव स्टार लेवल की थी। घाट से लौटकर मैं तो सीधे बिस्तर में पड़ लिया। कल मुझे एम. ए. (मास कॉम) की डिग्री लेनी थी। और कुछ हसीन ख्वाबों को देखने के लिए मैंने अपना चेहरा चादर से ढँक लिया था।
हाँ तो दीक्षान्त समारोह के लिए गाउन रिसीव करना भी कोई बच्चों का खेल नहीं था। लड़को की लाईन काफी लंबी थी और हमें अब लग रहा था कि अब उधार के गाउन से ही काम चलाना पड़ेगा। लेकिन किसी तरह आकांक्षा ने हमें गाउन दिलवा दिया। ये वही आकांक्षा थी जिसे मैं मिस हैरान-परेशान कहकर चिढ़ाया करता था। उस दिन वो न होती तो हमें बनारस की परंपरागत आपातकालीन व्यवस्था ‘जुगाड़’ का ही सहारा लेना पड़ता।
शाम को तय प्रोग्राम के अनुसार हम सभी अस्सी घाट पर गये। हमारी आधी क्लास ही आई थी दीक्षान्त समारोह में हिस्सा लेने, इसीलिए कुछ दोस्तों की कमी बुरी तरह खल रही थी। साल भर पहले हम सभी दोस्त मिलकर किसी भी दिन को उत्सव बना देते थे। आज की मस्ती कुछ कम तो थी पर दिल्ली की जिंदगी के सामने तो ये फाइव स्टार लेवल की थी। घाट से लौटकर मैं तो सीधे बिस्तर में पड़ लिया। कल मुझे एम. ए. (मास कॉम) की डिग्री लेनी थी। और कुछ हसीन ख्वाबों को देखने के लिए मैंने अपना चेहरा चादर से ढँक लिया था।
आँखों को अभी ख्वाब छुपाने नहीं आते।
(बशीर बद्र)
बुधवार, 16 मार्च 2011
एक शहर, बनारस..(भाग-1)
एक शहर, जिसका हर रूप इस देश के बाकी शहरों से काफी अलग है, जहाँ जिन्दगी काफी इत्मीनान से चलती है। दुनिया की आपाधापी से दूर इस शहर की अलग ही पहचान है। इस शहर ने मुझे तमाम खूबसूरत यादें दी हैं, कुछ बहुत अच्छे दोस्त दिए हैं। इस शहर को दुनिया बनारस के नाम से जानती है।
![]() |
| इ देखा बनारस हौ.... |
अभी कुछ दिन पहले अपने दोस्तों के साथ बनारस जाना हुआ। हम लोग बीएचयू के दीक्षांत समारोह में अपनी-2 डिग्रीयां लेने जा रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे वक्त फिर से पीछे की तरफ मुड़ गया है। बनारस रेलवे स्टेशन पर उतरते ही एक अजीब-सी खुशी का अनुभव हुआ। मैं फिर से उस शहर में था जहाँ मैंने अपनी जिंदगी के कुछ सबसे खूबसूरत दिन गुजारे थे। स्टेशन से बाहर निकलकर ऑटो पर बैठते ही अपने ढंग से चलते बनारस के दर्शन हो गये। कुछ चिर-परिचित संबोधनों ने ध्यान आकर्षित किया जो दिल्ली में बड़े ही कर्कश ढंग से कहे जाते हैं। हाँ, अब लग रहा था कि मैं बनारस में हूँ।
मंगलवार, 8 मार्च 2011
नारी...
अपनी ममता की छाँव में,
बच्चों को पालती,
वो एक माँ है।
हर सुख-दुख में साथ निभाती,
अर्धांगिनी है।
कभी तोतली जुबान में पुकारती,
और बाद में आँगन से विदा होती,
बेटी भी है।
अपने भाई के लिए,
सहर्ष त्याग करने वाली,
एक प्यारी-सी बहन है।
वो प्रेमिका है,
जो कभी रुठती है,
कभी मानती है।
वो शक्ति का रुप है,
वात्सल्य का स्वरुप है।
मानवता जिसकी आभारी है,
हाँ, वही तो नारी है।
बच्चों को पालती,
वो एक माँ है।
हर सुख-दुख में साथ निभाती,
अर्धांगिनी है।
कभी तोतली जुबान में पुकारती,
और बाद में आँगन से विदा होती,
बेटी भी है।
अपने भाई के लिए,
सहर्ष त्याग करने वाली,
एक प्यारी-सी बहन है।
वो प्रेमिका है,
जो कभी रुठती है,
कभी मानती है।
वो शक्ति का रुप है,
वात्सल्य का स्वरुप है।
मानवता जिसकी आभारी है,
हाँ, वही तो नारी है।
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